झारखंड का आर्थिक विकास कृषि के बिना संभव नहीं : डॉ. देव नाथन

झारखंड के अर्थ नीति पर शुक्रवार को आजसू पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय हरमू में एक परिचर्चा आयोजित किया गया। इसका आयोजन आजसू बुद्धिजीवी मंच ने किया था। इस परिचर्चा में विख्यात अंतरराष्ट्रीय समाजशास्त्री एवं लेखक प्रो0 डॉ देव नाथन ने अपना व्याख्यान दिया। झारखंड के वर्तमान आर्थिक, सामाजिक और बेरोजागारी जैसी विषयों पर विश्लेशन करते हुए कहा कि झारखंड के आर्थिक विकास कृषि के बिना संभव नहीं है।
डॉ देवनाथन ने कहा कि झारखण्ड का आर्थिक बुनियाद कृषि है। इसे ही क्रेंद्र में रखकर आर्थिक नीतियां बननी चाहिए। इसमें बागवानी, लघु उद्योग, घरेलु एवं कुटीर उद्योग, पर्यटन, पशुपालन एवं मत्स्य तथा मधुपालन जैसी ग्रामीण उद्योग को बढ़ावा देकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि झारखंड की भौगोलिक स्थिति क्षेत्र के हिसाब अलग-अलग है। किसानों की खेतों में पानी पहंुचाना सबसे बड़ा काम है। 
झारखंड में राजनीतिक सरगर्मी के बीच झारखंड के अर्थ नीति पर चर्चा करते हुए इसके प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया। इस परिचर्चा में झारखंड के तमाम ऐसे बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया, जो झारखंड की अर्थनीति को बढ़ाने पर अपनी समझ रखते हैं, वे अपनी महत्वपूर्ण बातें रखी। परिचर्चा का विषय परिवेश कराते हुए झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक डॉ संजय बसु मल्लिक ने कहा कि आजसू बुद्धिजीवी मंच, झारखंड के ज्वलंत विषयों पर समय-समय पर परिचर्चा आयोजित करने का निर्णय लिया है। जिससे कि बौद्धिक रूप से विषयों की जानकारी नेतृत्वकारियों को दिया जा सके और वैचारिक रूप से नेतृत्वकर्ता तैयार किया जा सके। इसकी शुरूआत आज विख्यात अंतरराष्ट्रीय समाजशास्त्री एवं लेखक प्रो0 डॉ देव नाथन के व्यख्यान से किया जा रहा है। 
चर्चा को आगे बढ़ाते हुए झारखंड आंदोलनकारी चिन्हितीकरण आयोग के सदस्य डॉ देवशरण भगत ने कहा कि झारखंड स्वाभाविक राज्य नहीं है। झारखंड संघर्ष से मिली हुई राज्य है। इसकी तुलना दूसरे राज्यों से नहीं की सकती। इस राज्य की अपनी क्षमता, विरासत को जाने बगैर राज्य की नीति तैयार नहीं की जा सकती। झारखंड में लंबे समय से जल-जंगल-जमीन के लिए संघर्ष होते रहा है। अलग राज्य आंदोलन के दरम्यान जो सबसे बड़ा विषय रहा है वह विस्थापन, पलायन और बेरोजगारी है। इसका सबसे बड़ा कारण खनिज खनन और कल-कारखाने हैं। 
डॉ भगत ने कहा कि जमीन से संबंधित बहुत सारे नियम कानून बनाये गये हैं। जिसमें सीएनटी, एसपीटी और विलकिल्सन रूल, पेशा कानून है, फिर भी भगवान बिरसा मुंडा के अबुआ दिशुम, अबुआ राज की परिकल्पना साकार नहीं हो पाया है। इसके कारणों को जानना होगा। 
जिला उपायुक्त रहे डॉ डोमन सिंह मुंडा ने कहा कि इस राज्य में सबचीज रहने के बावजूद भी एक कुशल नेतृत्व का घोर अभाव है। आज भी राज्य की नीति राज्य के बाहर से लिया जा रहा है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि इसके भग्यविधाता बाहर के लोग ही बन बैठे हैं।
पूर्व कुलपति और मारवाड़ी कॉलेज के प्राचार्य डॉ यूसी मेहता ने कहा कि राज्य की पहचान आज भी सस्ते मजदूर के श्रोत के रूप में है। झारखंड प्राकृतिक रूप से स्वर्ग से कम नहीं है। यहां का क्लाइमेंट विश्व के लोगों को आकर्षित करता है। झारखंड स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र हब बन सकता है। झारखंड को अपने विरासत पर गर्व करते हुए विकास की लकीर खिंचनी चाहिए। दूसरों का नकल करने की यहां जरूरत नहीं है।
कोल इंडिया के पूर्व निदेशक डॉ जेएन सिंह ने राज्य में कोयला खनन और उसके बदले मिला दंश के संदर्भ में अपनी बातें रखी। उन्होंने कहा कि खनिज के खनन के बदले यहां के लोगों को क्या मिला। केन्द्र से मिलनेवाले रॉयल्टी और खनन से हुए विस्थापित भूस्वामियों को खनन के पश्चात उनकी जमीन वापस नहीं होने पर चिंता जाहिर की। 
रांची विश्वविद्यालय के प्रो डॉ मुकुंद चंद्र मेहता ने कहा कि आर्थिक विकास के चार आधार हैं। इसमें कृषि, औद्योगिक, पर्यटन और खनिज है। चारों चीजें हमारे झारखंड में विद्यमान है। फिर हम पिछड़े राज्यों के श्रेणी में है। इसका एक मात्र कारण कुशल एवं दूरदर्शी नेतृत्व का अभाव है। इसको दूर किये बगैर झारखंड के दिशा-दशा ठीक नहीं किया जा सकता।
इस परिचर्चा में आइआरएस के पूर्व पदाधिकारी सनत मरांडी, झारखण्ड चेम्बर ऑफ कामर्स के पूर्व अध्यक्ष अंचल किंकर, वरिष्ठ अधिवक्ता हसन अंसारी, जयंत घोष, प्रो विनय भरत, जेवियर कुजूर, रायमनी मुण्डा, प्रतिमा कुजूर समेत कई बुद्धिजीवियों ने अपनी-अपनी बातें रखी।

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